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    सितम्बर, 2018 को भारतीय इतिहास में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए कुछ अभूतपूर्व फ़ैसलों के लिए याद किया जायेगा. सर्वोच्च न्यायालय ने समलैंगिकता और व्यभिचार पर 150 साल पुरानी अवधारणा को बदल दिया. कोर्ट ने कहा की निजता का अधिकार के तहत, राज्य नागरिकों के निजी जीवन में ताक-झाँक नहीं कर सकता इन्हें अपराध न मानते हुए इनमें निहित सज़ा के प्रावधान को भी ख़त्म कर दिए गए.

    न्यायाधीश या कोर्ट पूर्व आधारित तथ्यों पर ही सज़ा तय कर सकता है. और भारत में  सज़ा का प्रावधान ‘इंडियन पीनल कोड’ या भारतीय दंड सहिंता से परिभाषित होता हैं. और इसके जन्मदाता थॉमस बैबिंगटन मैकाले का आज जन्मदिन है.

    मैकाले ‘ब्रिटिश इंडिया’ के निर्माताओं में से एक है. इतिहासकार होने के अलावा वो राजनयिक भी था. सत्य है, उसने भारतीयों को हैय दृष्टि से देखा, पर ये भी उतना ही सच है, कि योगदान हमारी आने वाली क़ानूनी और सामाजिक प्रणाली का आधार बना. और हम आज भी उसके प्रभाव से नहीं उभर पाए हैं?

    मैकाले उन चंद अंग्रेज़ अफ़सरों में था जिसने ईस्ट इंडिया कंपनी के अफ़सरों के हाथों भारत के लोगों पर किये गए ज़ुल्मों के ख़िलाफ़ कड़ी टिपण्णी की. शशि थरूर ‘एन ऐरा ऑफ़ डार्कनेस’ में लिखते हैं कि मैकाले ने ईस्ट इंडिया कंपनी के कर्मचारियों की तुलना भारतीय नवाबों से की है. जिस तरह भारतीय नवाब आम जनता को लूटते थे, ईस्ट इंडिया कंपनी के ‘नवाब’ भी लूट का माल समुन्दर पार ले गए. उसने कहा था कि कम्पनी के अफसरों की कारगुज़ारियाँ हद दर्ज़े तक अमानवीय थीं कि समाज के लिहाज़ से अमान्य हैं.

    फ़रीद ज़ाकरिया की मानें तो इंग्लैंड में न्याय की व्यवस्था रोम से आई थी. फ़रीद, ‘Future of Freedom’ में लिखते हैं कि विश्व भर में कॉन्ट्रैक्ट, प्रॉपर्टी, मानहानि (Defamation) या विरासत (Inheritance) पर बनाये गए कानून रोम की देन हैं.’ पर भारत में हालात कुछ अलग थे यहाँ रोमन प्रभाव कम नज़र आता है. यहाँ न कोर्ट थीं, न न्यायाधीश. विवाद की स्तिथि में राजा का निर्णय मान्य था.

    गुरचरण दास, ‘India Grows At Night’ में लिखते हैं, कि ज़माने से भारत में शासन कमज़ोर था पर समाज मज़बूत था. इसीलिए संभव है कि, यहाँ दंड व्यवस्था स्थापित नहीं हो सकी. दूसरे शब्दों में कहें, यहाँ हर समाज के हिसाब से दंड विधान तय किये गए थे. एक ही अपराध के लिए शूद्रों के लिए सज़ा का प्रावधान अलग था और उच्च जाति के अलग. अक्सर, उच्च जाति के लोग दंड से बचकर निकलने के रास्ते थे और अगर नहीं तो सज़ा भुगतने में अंतर था..

    मैकाले ने सबके लिए एक ही दंड विधान बनाया जिसे भारत ही नहीं बल्कि ब्रिटेन के तमाम उपनिवेशों में लागू किया गया. मैकाले ने इस पर तीन वर्षों तक इस पर काम किया और ये  India के लिए उसका सबसे बड़ा योगदान कहा जा सकता है. इसको उसने 1837 में ही पूरा कर लिया था, पर इसे 1861, यानी, पूरे 34 साल बाद लागू किया गया.

    आज भी भारतीय दंड सहिंता का मुख्य आधार मैकालेकी परिकल्पना है. ये बात नहीं है कि उसने सिर्फ भारतीय दंड संहिता की रचना की, Civil Proceedings, Criminal Procedures, Laws of Property  भी उसी के हाथों बनाये हुए है.

    Taxation पर मैकाले के विचार एडम स्मिथ से मेल खाते हैं. ‘मिनट ऑफ़ एजुकेशन’ में उसने लिखा था कि वो 1834 से लेकर 1838 तक भारत में रहा और उसे टैक्स प्रणाली बड़ी अमानवीय लगी. उसके मुताबिक़ हर टैक्स के बाद सरकार अगर उसका स्पष्टीकरण देती फिरे है, तो ज़ाहिर है कि वो चीज़ ही ग़लत है.

    हम मैकाले को कोस सकते हैं, क्यूंकि कई मायनों में उसकी सोच ग़लत थी और रेसिस्ट थी. पर अगर सोचा जाए तो क्या उसके द्वारा स्थापित की गयी दंड और शिक्षा व्यवस्था ने भारतीयों के जीवन में समरसता का काम किया और देश हमारी राजनैतिक और सामाजिक आज़ादी का आधार बनीं.

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